मंगलवार, 22 मार्च 2011

कथा यू.के. को फ़्रेड्रिक पिन्कॉट सम्मान


(महामहिम श्री नलिन सूरी कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा को पुरस्कार की धनराशि प्रदान करते हुए। साथ हैं श्रीमती ज़कीया ज़ुबैरी (संरक्षक) एवं दीप्ति शर्मा, उपसचिव।)
लंदन – 20 मार्च 2011, ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त महामहिम श्री नलिन सूरी ने कथा यू.के. को हिन्दी साहित्य एवं भाषा के प्रचार प्रसार के लिये वर्ष 2010 का फ़्रेड्रिक पिन्कॉट सम्मान प्रदान करते हुए उनके कार्यक्रमों की भूरि भूरि प्रशंसा की।

सम्मान ग्रहण करते हुए तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव – कथा यू.के.) ने उच्चायोग को धन्यवाद दिया कि कथा यू.के. द्वारा हिन्दी साहित्य को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिये किये जा रहे काम को सराहना मिली है। उन्होंने अम्बेडकर हॉल में उपस्थित मेहमानों को बताया कि कथा यू.के. हर वर्ष ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में भारतीय साहित्य को स्थापित करने के लिये अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान का आयोजन करती है।

तेजेन्द्र शर्मा ने आगे कहा कि पिछले वर्ष कथा यू.के. ने टोरोंटो (कनाडा) में एक हिन्दी कहानी की कार्यशाला का आयोजन किया था जबकि इसी वर्ष फ़रवरी में डी.ए.वी. कॉलेज यमुना नगर के साथ मिल कर भारत में तीन दिवसीय प्रवासी कहानी सम्मेलन का भी आयोजन किया था। कथा यू.के. समय समय पर हिन्दी सिनेमा से जुड़े कार्यक्रमों का भी आयोजन करती रही है।

उन्होंने आगे सूचना दी कि आगामी 14 अप्रैल 2011 को कथा यू.के. हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है जिसमे भारत के प्रमुख मोटिवेशनल स्पीकर श्री मिनोचर पटेल श्रोताओं से बात करेंगे। उनके भाषण का मुख्य मुद्दा होगा- हैपिनेस दि इंडियन वे। उन्होंने भारतीय उच्चायोग, आई.सी.सी.आर एव् नेहरू सेन्टर का निरंतर समर्थन के लिये धन्यवाद किया।

इस कार्यक्रम में उषा राजे सक्सेना को हरिवंशराय बच्च्न सम्मान, स्वर्गीय महावीर शर्मा को हज़ारी प्रसाद द्विवेदी सम्मान (पत्रकारिता – मरणोपरांत), एवं एश्वर्ज कुमार को जॉन गिलक्रिस्ट सम्मान (अध्यापक) भी प्रदान किये गये।

कार्यक्रम का आयोजन भारतीय उच्चायोग लंदन में किया गया। उप-उच्चायुक्त श्री प्रसाद एवं मंत्री संस्कृति श्रीमति मोनिका मोहता मंच पर आसीन थे। हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार ने संचालन किया।

सोमवार, 7 मार्च 2011

“ऐ भाई ज़रा देख के चलो... से शुरू हुआ नया हिन्दी फ़िल्मी मुहावरा” – तेजेन्द्र शर्मा


हिंदी फ़िल्मी गीतों में हिंदी - यह विषय था ४ मार्च की संध्या को हुए उस रोचक आयोजन का जिसे नेहरु सेंटर में कथा यू के, एशियन कम्युनिटी आर्ट्स और नेहरु सेंटर के सौजन्य से आयोजित किया गया था।
सुन्दर पुराने, नए हिंदी गीतों से भरी इस शाम पर एक शानदार पॉवर-पॉइंट प्रेजेंटेशन दिया कथा यू के .के महासचिव श्री तेजेंद्र शर्मा ने। इस खूबसूरत शाम का आगाज़ किया नेहरु सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता जी ने. फिर हुआ शुरू हिंदी गीतों का सुन्दर सफ़र। इस आयोजन का मुख्य आधार यह बताना था कि हिंदी फिल्मो में हिंदी कविता की शुरुआत कैसे हुई और वह किन रास्तों से गुजर कर कहाँ तक पहुंची।

तेजेन्द्र शर्मा ने अपने प्रेजेंटेशन के माध्यम से कहा कि " पुराने समय में हिंदी गीतों को लिखने वाले जैसे मजरूह सुल्तानपुरी, डी. एन. मधोक, राजेन्द्र कृष्ण, साहिर, हसरत, कैफ़ी आज़मी आदि मूलत: उर्दू में लिखा करते थे और किसी ख़ास विषय या आयोजन पर ही हिंदी का प्रयोग किया करते थे। दरअसल यह लोग हिन्दी और पंजाबी भी उर्दू लिपि में लिखते थे।
फ़िल्मी गीतों में हिन्दी शब्दावली का प्रयोग तभी होता यदि फ़िल्म क्लासिकल संगीत पर आधारित होती या फिर गांव के जीवन पर। इसी तरह भजन या त्यौहारों के गीतो में में ही हिंदी का प्रयोग किया जाता था। उस समय की चित्रलेखा, आम्रपाली, झनक झनक पायल बाजे के गीत, जैसी फ़िल्मों में और अन्य फ़िल्मों के भजन तथा होली के गीतों में हिन्दी सुनाई देती।

आगे बोलते हुए तेजेन्द्र शर्मा जी ने कहा कि उस समय सभी गीतों में वही निश्चित स्थाई और अंतरे की परंपरा रहती थी जिससे कि गीतकार ऊबने लगे थे .और पहली बार लैला मजनू में शक़ील बदायुनी ने एक सीधी नज़्म लिखी - चल दिया कारवां. लुट गये हम यहां तुम वहां..... ठीक इसी तरह कैफ़ी ने फ़िल्म हक़ीकत में – मैं यह सोच कर उसके दर से उठा था... और डी. एन. मधोक ने तस्वीर में - दुनियां बनाने वाले ने जब चांद बनाया.... जैसे नग़मों में स्थाई और अंतरे को विदाई देने का प्रयास किया।

कवि प्रदीप, नरेन्द्र शर्मा, भरत व्यास, इन्दीवर शैलेन्द्र, नीरज आदि गीतकारों ने - सत्यम शिवम सुन्दरम, रजनी गंधा फूल.. आदि बेहतरीन हिंदी गीत हिंदी फिल्मो को दिए। परन्तु उनके गीत भी उर्दू नग़मों की ही तरह स्थाई और अंतरे में बन्धे रहते। यहां तक कि हिंदी का प्रयोग गानों में हिन्दी का मज़ाक उड़ाने के लिये भी किया जाता था एक सुन्दर हिंदी के गीत का कॉमेडी की तरह फिल्मीकरण करके उसका मजाक सा बना दिया जाता था - यदि आप हमें आदेश करे तो प्रेम का हम श्री गणेश करें....एक ऐसा ही गीत था जिसे कुछ अलग तरह फिल्माया जाता तो शायद इसका रूप ही अलग होता।

यह कहना अनुचित न होगा कि वर्तमान हिन्दी फ़िल्मी गीतों की शुरूआत हमें राज कपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर तक ले जाती है। इस फ़िल्म के लिये कवि नीरज ने एक कविता लिखी जिसका संगीत शंकर जयकिशन ने बनाया था - ए भाई जरा देख के चलो.....और इस गीत ने हिंदी गीतों की परिभाषा बदल कर रख दी। उसके बाद आया गुलज़ार का - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है ...और हिंदी गीतों में हिंदी कविता का नया रूप चल पड़ा। आज गुलज़ार,जावेद अख्तर,समीर, फैज़ अनवर,प्रसून जोशी जैसे गीतकार बिना स्थाई अन्तर वाले बेहतरीन गीत लिख रहे हैं और युवा पीढी उसे पूरे मन से सराह रही है।


फिर भी कभी कभी सुनने को मिलता है कि आज के गीतों में पुराने गीतों सी बात नहीं ..वह इसलिए कि हम गीत सुनते हैं, समझते नहीं. आज -फिल्म राजनीति का मेरे पिया मोसे बोलत नाहीं, रॉकेट सिंह का ख़्वाबों को... , तारे जमीं पर का माँ....आदि ऐसे कितने ही गीत आज लिखे जा रहे हैं जिनमें हिंदी कविता का बेहतरीन रूप देखने को मिलता है यहाँ तक कि दबंग जैसी निहायत ही व्यावसायिक फिल्म में भी हिन्दी मुहावरों से युक्त गीत देखने को मिलते हैं।

तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि आज के समय में गहरे अर्थ वाले कवितामय गीत लिखे जा रहे हैं और गुलज़ार ,जावेद अख्तर जैसे गीतकार युवा गीतकारों और भावों को पूरी टक्कर दे रहे हैं .बस जरुरत है गीतों को सुनने की समझने की।

पूरी शाम बेहतरीन गीतों से सजी हुई थी और श्रोता भाव विभोर से होकर उन गीतों का ना सिर्फ आनंद ले रहे थे बल्कि उसके सफ़र में भी हमराह हो रहे थे. उस पर हिंदी गीतों के सफ़र के साथी रहे, तेजेन्द्र शर्मा के अपने कुछ निजी और रोचक अनुभवों ने सभी श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया। कार्यक्रम में नैन सो नैन (झनक झनक पायल बाजे), मन तड़पत हरि दर्शन को आज (बैजू बावरा), अरे जा रे हट नटखट.. (नवरंग), संसार से भागे फिरते हो (चित्रलेखा), प्रिय प्राणेश्वरी.. यदि आप हमें आदेश करें...(हम तुम और वो), ऐ भाई ज़रा देख के चलो... (मेरा नाम जोकर), इकतारा इकतारा (वेक अप सिड), मां... (तारे ज़मीन पर), पंखों को समेट कहीं रखने दो.... (रॉकेट सिंह), मोरे पिया मोसे बोले नाहीं (राजनीति), उड़ दबंग... (दबंग) आदि गीतों को स्क्रीन पर दिखाया गया।
इस बेहद खूबसूरत शाम का समापन एशियन कम्युनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने वहां उपस्थित सभी आम और खास मेहमानों का धन्यवाद करके किया।

इस रंगीन और खूबसूरत गीतों और जानकारी से भरी शाम में मोनिका मोहता (निदेशक-नेहरू सेंटर), काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, सुश्री पद्मजा (फ़र्स्ट सेक्रेटरी – प्रेस एवं सूचना, भारतीय उच्चायोग), श्री आनंद कुमार (हिन्दी अधिकारी – भारतीय उच्चायोग), कैलाश बुधवार (पूर्व बी बी सी हिंदी प्रमुख ), प्रो. अमीन मुग़ल, डा. नज़रुल इस्लाम बोस, अरुणा अजितसरिया, सुरेन्द्र कुमार, दिव्या माथुर, दीप्ति शर्मा, अब्बास एवं रुकैया गोकल आदि सहित लन्दन के बहुत से गण्यमान्य व्यक्ति एवं संगीत प्रेमी उपस्थित थे...

- शिखा वार्ष्णेय