सोमवार, 7 मार्च 2011

“ऐ भाई ज़रा देख के चलो... से शुरू हुआ नया हिन्दी फ़िल्मी मुहावरा” – तेजेन्द्र शर्मा


हिंदी फ़िल्मी गीतों में हिंदी - यह विषय था ४ मार्च की संध्या को हुए उस रोचक आयोजन का जिसे नेहरु सेंटर में कथा यू के, एशियन कम्युनिटी आर्ट्स और नेहरु सेंटर के सौजन्य से आयोजित किया गया था।
सुन्दर पुराने, नए हिंदी गीतों से भरी इस शाम पर एक शानदार पॉवर-पॉइंट प्रेजेंटेशन दिया कथा यू के .के महासचिव श्री तेजेंद्र शर्मा ने। इस खूबसूरत शाम का आगाज़ किया नेहरु सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता जी ने. फिर हुआ शुरू हिंदी गीतों का सुन्दर सफ़र। इस आयोजन का मुख्य आधार यह बताना था कि हिंदी फिल्मो में हिंदी कविता की शुरुआत कैसे हुई और वह किन रास्तों से गुजर कर कहाँ तक पहुंची।

तेजेन्द्र शर्मा ने अपने प्रेजेंटेशन के माध्यम से कहा कि " पुराने समय में हिंदी गीतों को लिखने वाले जैसे मजरूह सुल्तानपुरी, डी. एन. मधोक, राजेन्द्र कृष्ण, साहिर, हसरत, कैफ़ी आज़मी आदि मूलत: उर्दू में लिखा करते थे और किसी ख़ास विषय या आयोजन पर ही हिंदी का प्रयोग किया करते थे। दरअसल यह लोग हिन्दी और पंजाबी भी उर्दू लिपि में लिखते थे।
फ़िल्मी गीतों में हिन्दी शब्दावली का प्रयोग तभी होता यदि फ़िल्म क्लासिकल संगीत पर आधारित होती या फिर गांव के जीवन पर। इसी तरह भजन या त्यौहारों के गीतो में में ही हिंदी का प्रयोग किया जाता था। उस समय की चित्रलेखा, आम्रपाली, झनक झनक पायल बाजे के गीत, जैसी फ़िल्मों में और अन्य फ़िल्मों के भजन तथा होली के गीतों में हिन्दी सुनाई देती।

आगे बोलते हुए तेजेन्द्र शर्मा जी ने कहा कि उस समय सभी गीतों में वही निश्चित स्थाई और अंतरे की परंपरा रहती थी जिससे कि गीतकार ऊबने लगे थे .और पहली बार लैला मजनू में शक़ील बदायुनी ने एक सीधी नज़्म लिखी - चल दिया कारवां. लुट गये हम यहां तुम वहां..... ठीक इसी तरह कैफ़ी ने फ़िल्म हक़ीकत में – मैं यह सोच कर उसके दर से उठा था... और डी. एन. मधोक ने तस्वीर में - दुनियां बनाने वाले ने जब चांद बनाया.... जैसे नग़मों में स्थाई और अंतरे को विदाई देने का प्रयास किया।

कवि प्रदीप, नरेन्द्र शर्मा, भरत व्यास, इन्दीवर शैलेन्द्र, नीरज आदि गीतकारों ने - सत्यम शिवम सुन्दरम, रजनी गंधा फूल.. आदि बेहतरीन हिंदी गीत हिंदी फिल्मो को दिए। परन्तु उनके गीत भी उर्दू नग़मों की ही तरह स्थाई और अंतरे में बन्धे रहते। यहां तक कि हिंदी का प्रयोग गानों में हिन्दी का मज़ाक उड़ाने के लिये भी किया जाता था एक सुन्दर हिंदी के गीत का कॉमेडी की तरह फिल्मीकरण करके उसका मजाक सा बना दिया जाता था - यदि आप हमें आदेश करे तो प्रेम का हम श्री गणेश करें....एक ऐसा ही गीत था जिसे कुछ अलग तरह फिल्माया जाता तो शायद इसका रूप ही अलग होता।

यह कहना अनुचित न होगा कि वर्तमान हिन्दी फ़िल्मी गीतों की शुरूआत हमें राज कपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर तक ले जाती है। इस फ़िल्म के लिये कवि नीरज ने एक कविता लिखी जिसका संगीत शंकर जयकिशन ने बनाया था - ए भाई जरा देख के चलो.....और इस गीत ने हिंदी गीतों की परिभाषा बदल कर रख दी। उसके बाद आया गुलज़ार का - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है ...और हिंदी गीतों में हिंदी कविता का नया रूप चल पड़ा। आज गुलज़ार,जावेद अख्तर,समीर, फैज़ अनवर,प्रसून जोशी जैसे गीतकार बिना स्थाई अन्तर वाले बेहतरीन गीत लिख रहे हैं और युवा पीढी उसे पूरे मन से सराह रही है।


फिर भी कभी कभी सुनने को मिलता है कि आज के गीतों में पुराने गीतों सी बात नहीं ..वह इसलिए कि हम गीत सुनते हैं, समझते नहीं. आज -फिल्म राजनीति का मेरे पिया मोसे बोलत नाहीं, रॉकेट सिंह का ख़्वाबों को... , तारे जमीं पर का माँ....आदि ऐसे कितने ही गीत आज लिखे जा रहे हैं जिनमें हिंदी कविता का बेहतरीन रूप देखने को मिलता है यहाँ तक कि दबंग जैसी निहायत ही व्यावसायिक फिल्म में भी हिन्दी मुहावरों से युक्त गीत देखने को मिलते हैं।

तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि आज के समय में गहरे अर्थ वाले कवितामय गीत लिखे जा रहे हैं और गुलज़ार ,जावेद अख्तर जैसे गीतकार युवा गीतकारों और भावों को पूरी टक्कर दे रहे हैं .बस जरुरत है गीतों को सुनने की समझने की।

पूरी शाम बेहतरीन गीतों से सजी हुई थी और श्रोता भाव विभोर से होकर उन गीतों का ना सिर्फ आनंद ले रहे थे बल्कि उसके सफ़र में भी हमराह हो रहे थे. उस पर हिंदी गीतों के सफ़र के साथी रहे, तेजेन्द्र शर्मा के अपने कुछ निजी और रोचक अनुभवों ने सभी श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया। कार्यक्रम में नैन सो नैन (झनक झनक पायल बाजे), मन तड़पत हरि दर्शन को आज (बैजू बावरा), अरे जा रे हट नटखट.. (नवरंग), संसार से भागे फिरते हो (चित्रलेखा), प्रिय प्राणेश्वरी.. यदि आप हमें आदेश करें...(हम तुम और वो), ऐ भाई ज़रा देख के चलो... (मेरा नाम जोकर), इकतारा इकतारा (वेक अप सिड), मां... (तारे ज़मीन पर), पंखों को समेट कहीं रखने दो.... (रॉकेट सिंह), मोरे पिया मोसे बोले नाहीं (राजनीति), उड़ दबंग... (दबंग) आदि गीतों को स्क्रीन पर दिखाया गया।
इस बेहद खूबसूरत शाम का समापन एशियन कम्युनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने वहां उपस्थित सभी आम और खास मेहमानों का धन्यवाद करके किया।

इस रंगीन और खूबसूरत गीतों और जानकारी से भरी शाम में मोनिका मोहता (निदेशक-नेहरू सेंटर), काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, सुश्री पद्मजा (फ़र्स्ट सेक्रेटरी – प्रेस एवं सूचना, भारतीय उच्चायोग), श्री आनंद कुमार (हिन्दी अधिकारी – भारतीय उच्चायोग), कैलाश बुधवार (पूर्व बी बी सी हिंदी प्रमुख ), प्रो. अमीन मुग़ल, डा. नज़रुल इस्लाम बोस, अरुणा अजितसरिया, सुरेन्द्र कुमार, दिव्या माथुर, दीप्ति शर्मा, अब्बास एवं रुकैया गोकल आदि सहित लन्दन के बहुत से गण्यमान्य व्यक्ति एवं संगीत प्रेमी उपस्थित थे...

- शिखा वार्ष्णेय

1 टिप्पणी:

  1. आपका ये लेख बेहतरीन था फ़िल्मी गीतों पर इस तरह के कुछ और लेख कहीं आपकी नज़र में हों तो कृपया मुझे सूचित करें.

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